आखिर क्यों रहते है ओलंपिक्स में भारत के कम पदक !

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125 करोड़ की जनसँख्या वाला देश होने के बावजूद भी भारत का ओलंपिक्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय खेलों में प्रदर्शन साधारण ही रहता है, जबकि भारत को एक युवा देश कहा जाता है जिसकी तक़रीबन आधी जनसँख्या युवा है। ऐसा भी नहीं कि भारत में हुनर की कमी है, देश बहुमुखी प्रतिभा के धनी युवाओं से भरा पड़ा है। अगर पिछले कुछ ओलंपिक्स पर नज़र डाली जाये तो भारत इका-दुका पदक ही जीत पाया है, इस बार भी भारत का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है।

ऐसे क्या कारण है कि इतना प्रतिभावान देश होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में छोटे छोटे देशों से भी पिछड़ जाता है, हमें सभी कारणों का पता लगा कर खेलों में देश को एक नए मुकाम पर पहुँचाना है। ऐसा भी नहीं है की यह एक दम से हो जायेगा और अगली प्रतियोगता में हम 5 पदकों से 50 पदकों तक पहुँच जायेंगे, फिर भी हमे कोशिश करनी चाहिए और एक लक्ष्य रख कर अपनी खामियों को दूर करके अगले ओलंपिक्स के लिए बेहतरीन खिलाड़ियों को तैयार करना होगा।

मेरे व्यक्तिगत विचारों से किसी का सहमत या असहमत होना स्वभाविक है, मेरे अनुसार भारत जिन्ह कारणों से पिछड़ जाता है वो में विस्तार पूर्वक लिख रहा हूँ –

1. राजनीतिक हस्तक्षेप – यह भारत में खेलों की दुर्गति है सबसे बड़ा कारण है, ज्यादातर अन्य कारण राजनीतिक हस्तक्षेप के इर्द-गिर्द घूमते है, मैं क्या देश का हर बुद्धिजीवी यह भली भांति जानता है की खेलों में राजनीतिक हस्तक्षेप दिनवर दिन बढ़ता जा रहा है, और भारत में खेलों का स्तर गिरता जा है। जिस तरह से खेल संघों और एसोसिएशन में राजनीति से जुड़े लोग बैठे है, वो सिर्फ अपने मन मुताबिक फैसले लेते हैं और देश हित, खेल हित में कम ही ध्यान देते है। खेल संघों से जुड़े हुए कुछ पदाधिकारी कैसे अपने बच्चों और जान-पहचान को खिलाड़ी के तौर पर शामिल करवा देते हैं, इस तरह के भ्र्ष्टाचार से जाने कितने ही प्रतिभावान खिलाड़ी अपने सपनों को साकार नहीं कर पाते। जिस तरह देश में सिपारिशों का दौर है वो खेलों में भी है। जब तक राजनीतिक हस्तक्षेप रहेगा तब तक भारत सही मायने में खेलों में प्रगति नहीं कर सकता। भारत सरकार को कड़ा संज्ञान लेना चाहिए और हर पदाधिकारी की जबाबदेही तय होनी चाहिये, कि क्यों भारत अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पता।

2. खेल सुविधाएँ – अकेले खिलाड़ी की प्रतिभा ही मेडल नहीं जीता सकती, अंतरराष्ट्रीय स्तर की चुनौती के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधा भी मिलनी चाहिए, जिस तरह हाल ही में खबरें आ रही थी, की खिलाड़ियों की 36 घण्टे इकॉनमी क्लास में सफर करवाया गया और अधिकारियों को बिज़नस क्लास में, तो फिर खिलाड़ियों से पदक की आस भी नहीं रखनी चाहिए। जब तक अत्याधुनिक खेल किट्स और विश्वस्तरीय प्रशिक्षण नहीं मिलेगा, तब तक खिलाड़ी पदक कैसे जीत सकेगा? बिना सुविधाओं की वजह से खिलाड़ियों पर अतिरिक्त दबाव रहता है, जो हमेशा खेल परिणाम को प्रभावित करता है। अब जरुरत है कि खेल के साथ-साथ खेल सुविधाओं पर भी जोर दिया जाये, इस बात में कोई शक नहीं अगर सही सुविधाएँ मिले तो परिणाम कुछ और ही होंगे।

3. प्रोत्साहन – देश में सिर्फ़ क्रिकेट की ही बात होती है, सिर्फ़ क्रिकेट ही खेल रह गया है। बाकि खेल और खिलाड़ियों की जो दशा है और सन्यास के बाद जो होती है, सारे भली-भांति जानते है, हाल ही में ख़बरों की कुछ पूर्व खिलाड़ियों को सब्जियां बेचेते दिखाया गया, और एक पूर्व हॉकी खिलाडी जिन्होंने ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया उनके इलाज के लिए साथी खिलाड़ी ने जूते पालिश कर के चंदा इकठ्ठा किया। इस तरह की घटनाएँ झकझोर देती है और यह कितने दुःख की बात है जिस देश का नेता करोड़ों की कार खरीद सकता है, करोड़ों खर्च कर के ओलंपिक्स में जाता हो उस देश के पास खिलाड़ियों के लिए पैसे नहीं है। इन सभी वजहों से क्रिकेट के अलावा किसी और खेल में कोई जाना नहीं चाहता, जब तक देश में बाकि खेलों को भी खेल समझ जायेगा और बराबर प्रोत्साहन नहीं मिलेगा हालात टस से मस नहीं होंगे।

अब सवाल यह उठता है की क्रिकेट के बाकि खेलों में कैसे स्तर ऊँचा हो और पदक आएं, हमे जरुरत है की अन्य देशों से सीख लें और वैसी ही योजनाएं बनाई जाये, चरण बद्ध तरीके से काम किया जाये तो भारत भी बाकि देशों का मुकाबला कर सकता है, उदाहरण के लिए अगर भारत और अमेरिका के किसी एक रनर की तुलना की जाये, तो साफ़ तौर पर सामने आएगा की भारतीय रेसर को मिलने वाली सुविधाएँ नाकाफ़ी हैं, अभ्यास से साथ-साथ आधुनिक रेस ट्रैक, किट्स, फ़ूड सप्लीमेंट्स, मनोविज्ञानिक ट्रेनिंग अति आवश्यक है। जब तक खिलाड़ी शारीरक और मानसिक रूप से तैयार नहीं होता, तब तक वो सफल नहीं होगा। खिलाड़ी को अति आत्मविश्वास भी न हो और न ही किसी तरह का घमंड हो, ये बातें भी खेल को प्रभावित करती है।

एक और महत्वपूर्ण कारण है, भविष्य क्रिकेट और कुछ अन्य चुनिदां खेलों को छोड़ के भारत में किसी भी खेल में सुरक्षित करियर नहीं है, यह एक मुख्य वजह है जिससे अभिभावक अपने बच्चों के लिए खेलों के अलावा भी किसी अन्य फील्ड को चुनते है, जिससे जो बच्चे खेल में बहुत अच्छे होते है वो भी खेल में आते नहीं या पूरा समय नहीं दे पाते। भारत का इतिहास भी गवाह है की किस तरह कई चैम्पियन खिलाड़ी सन्यास के बाद मुश्किल से गुजर-बसर कर रहे हैं। इस तरह का हतोऊत्साहित करने वाला इतिहास हो तो कौन अपने बच्चों को खेल में करियर बनाने के लिए प्रेरित करेगा !

कुछ ऐसे स्कूल हो जो खेल स्कूल ही हों, वहां खेल प्रमुख पढ़ाई हो और बाकि पढ़ाई का ज्यादा बोझ न हो। इन स्कूलों में उन चुनिंदा प्रतिभाओं को तराशा जाये जिनमें हुनर की कमी न हो। अगर हम 10 -11 साल के बच्चों को ले के इस तरह से तैयारी करेगें तो बहुत जल्दी बेहतरीन परिणाम मिलेगें। देश में ही ऐसे अत्याधुनिक खेल परिसरों का निर्माण किया जाये जहाँ खिलाड़ियों को हर सुविधा उपलब्ध हो, जैसे बाकि देशों के खिलाड़ियों को मिलती हो, रही बात बजट की तो उन तमाम खेल संघों और एसोसिएशन को तत्काल प्रभाव से खत्म कर देना चाहिए, और सारी जिम्मेवारी खेल मंत्रालय को हो जो खेल स्कूलों का संचालन करे। जो खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करते हैं उन्हें प्रतिमाह भत्ता या तनख्वाह मिले जिससे ज्यादा से ज्यादा युवाओं का खेल के प्रति रुझान बढेगा और भारत खेल नई ऊंचाइयों को छुएगा।

जब कोई खिलाड़ी पदक जीतता है तो सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं वो देश भी पदक जीतता है, जब हारता है तो देश भी हारता है, खेल एक तरह से देश का मन-सम्मान है, जिसके लिए सही नीति बनानी चाहिए ताकि ताकि देश ज्यादा पदक जीते। में यही आशा करता हूँ की अगले ओलंपिक्स में भारत कम से कम 20 पदक जीते।

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