हर बार बरसात बहा ले जाती है हजारों सपने

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इस बार हिमाचल में बरसात औसतन रही कुछ जगहों को छोड़ कर इतनी खास बरसात हुई नहीं, जिला मंडी में तो औसत से भी कम ही रही। औसतन बरसात होने के बावजूद बरसात ने हर बार की तरह इस बार भी हिमाचल को काफ़ी चोटें पहुँचाई। आम जनता और सरकार हमेशा ही बरसात को लेकर लापरवाह रही है, बरसातें शुरू होने से पहले न तो कोई आपदा प्रबंध किये गए न ही विपदा आने पर सही ढंग से निपटा गया। हर बार सरकार को दोषी ठहराना जायज नहीं है, लोगों को भी अपनी जिम्मेबारिओं को समझना चाहिए, फिर भी जबाबदेही तह होनी चाहिए उन सड़कों और पुलों के लिए जो हलकी बरसात भी सह नहीं पाते।

इस बार बरसात के कारण कई मकान ढह गए, जिनमें काफ़ी जान-माल का नुकसान हुआ, सुर्ख़ियों में रहा रोहड़ू में गिरा बहुमंजिला मकान, सही मायने में मकान मालिक की लापरवाही ही थी, जिस तरह निर्माण में नियमों को ताक पर रख कर बेतरतीब बनाया गया मकान गिरा, उससे लोगों को सबक लेना चाहिए की ऐसी घटना दोवारा न हो। कुछ इसी तरह पिछले साल बरसात ने रौद्र रूप दिखा कर मंडी जिला के धर्मपुर में तबाही मचाही थी, लोग हादसों से सबक नहीं लेते जिसका नतीजा बुरा ही होता है।

अभी तक हिमाचल में तक़रीबन 25 लोगों की मौत बरसात के कारण हो चुकी है, और कितने ही घायल हुए हैं। बरसात के कारण कई सड़कों को भरी नुकसान हुआ, कुछ पुल बरसात में बह गए, कई घर ढह गए, जमीन खिसकने से पुरे के पुरे गांव पर खतरा मंडराता है। हर साल करोड़ों रूपये और कीमती जिंदगियों का नुकसान झेलने के बावजूद भी कभी कोई ठोस कदम उठाये नहीं गए, अगर समय रहते सही कदम उठाये जायेंगे तो कम से कम नुकसान को तो कम किया जा सकता है।

प्रकृति से जब तक इंसान खिलवाड़ करता रहेगा तब तक खिलवाड़ का खामयाजा भुगतना ही पड़ेगा। अगर पहाड़ों के वैध और अवैध कटान रुक जाये या कटान का सही प्रबंधन हो तो कितने ही लैंड स्लाइड रुक जायेगें!अंधाधुंध पेड़ों का कटान, जिसकी वजह से मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है और जमीन खिसकने का ख़तरा बढ़ जाता है। नदियों और खड्डों से अवैध तरीके से पत्थर, रेत और बजरी निकलने की वजह से नदियों के रुख मुड़ जाते हैं और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।

बारिश एक कुदरती प्रकिया है जिसमें इंसान कुछ नहीं कर सकता की कहाँ कितनी बारिश हो और कहाँ कितनी! फिर भी अगर सही और सुनोयोजित ढंग निपटा जाये तो काफ़ी हद तक बचाव किया जा सकता है। नदियों और नालों का तटीकरण और चेकडैम बना कर भूस्खलन और बाढ़ को कम किया जा सकता है। नदियोन और नालों से पास घर और अन्य निर्माण से बचा जाये, यह खुद के पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने जैसा है। कमजोर पहाड़ियों की तलहटी में भी घर इत्यादि नहीं बनाने चाहिए, जहाँ लैंड स्लाइड का खतरा हमेशा बना रहता है। बादल फटना और लैंडस्लाइड होने को रोका नहीं जा सकता पर नुकसान हो कम जरूर किया जा सकता है। हमें अपने सपनों को इस तरह बुनना चाहिए की वो बरसात में न बह जाएँ।

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